Saturday, April 26, 2008

जाना हो तो जाओ !

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जाना हो तो जाओ मगर कुछ पढ़ते- सुनते जाओ; मेरे भावों के उद्वेग को दो क्षण देखते जाओ।

मन में आशा का जो बीज बोया था तुमने वो अब पौधा हो चला है- जाना हो तो जाओ; जड़ों में मट्ठा देकर जाओ।

साथ तुम्हारे हुमको कुछ, लक्ष्य मिले; नए उद्येश्य मिले- जाना हो तो जाओ; मगर नए ध्येय सुझाते जाओ।

तुम्हारी सहायता से अपना एक रूप, पीछे छोड़कर आए हैं - जाना हो तो जाओ मगर सत्मार्ग बताते जाओ।

अब तक की सहयात्रा से अनेक मधुर स्म्रतियाँ जुड़ बैठी हैं - जाना हो तो जाओ; इनकी हत्या करते जाओ।
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रात और योद्धा


रात के निबिड़ अन्धकार को चीरते हुए दीपक ; मरघट से सन्नाटे में दूर कहीं, बैलों के गले में बंधी घंटियों की सरगम; कालिमा को चुनौती देते चन्द्रमा और नक्षत्र - कौन कहता है कि गाँवों में रात शिथिल होती है ?

ये सब मात्र विरोधाभास नहीं; उस संघर्ष की ओर इंगित करते हैं जो स्वर्ण-पुरूष का आगमन होते ही किसी को खेत में; किसी को घर के चूल्हे के आगे; किसी को कतरनी पर; किसी को बाग़ में करना होगा।

क्यूंकि हमारी पुस्तकों के प्रष्ठ भले ही रक्त-रंजित युद्धों का बखान करें असल युद्ध तो कृषक खेत में, मौसम की रुखाई से; स्त्रियाँ घर में चूल्हे के आगे झुलसाने वाली गर्मी से और कहीं कोई निर्धन अपने रोग से लड़ता है।

योद्धाओं को देखने किसी छावनी में जाने की आवश्यकता ही क्या जब हमारे-आपके बीच ऐसे-ऐसे योद्धा मौजूद हैं जो हर दिन अस्तित्व का युद्ध लड़ते हैं - अपने लिए और अपने परिवार के लिए।