दहेज़-ह्त्या: अग्नि से प्रश्न- एक लघु-कवितात्राहि-त्राहि करती रही वह दानवों के मध्य में; क्यों न तुम उन दानवों के अंत की वाहक बनी?
उस निर्दोष बालिका के शरीर को झुलसाते हुए; तुम पसीज कर क्यों नहीं जल की बूँदें बनी?
सोचकर वह द्रश्य रोम-रोम काँप उठता है- तुम क्यों ना कांपी और कैसे प्रज्वलित रही?
मानव-जन्य तो नहीं हो तुम- तुम तो देवांश हो- पर यह कैसा ईश्वरत्व कि निर्बल की हन्ता बनी?




